सोमवार, 24 जून 2019

इंदिरा गांधी पर जयराम नरेश की किताब

किताब पढ़ने के मामले में मन में पूर्वग्रह नहीं पालना चाहिए। मैंने बरसों नेहरु पर लिखी एम जे अकबर की किताब इसलिए नहीं पढ़ी क्योंकि मैं उनको कांग्रेस का नेता समझता रहा। बाद में पढ़ी तो समझ में आया कि कितनी अच्छी किताब थी। यही हाल दिनकर जी की किताब 'लोकदेव नेहरु' के साथ हुआ। दिनकर जी सांसद थे। कांग्रेस उनकी पार्टी थी। नेहरु उनके नेता थे इसलिए इस किताब को पढ़ने का मुझे कोई औचित्य नहीं लगा। बाद में अचानक एक दिन पढ़ने लगा तो पूरी किताब पढ़कर ही रुका। नेहरु की जैसी बारीक आलोचना उस किताब में है वैसी शायद उनके किसी क़रीबी माने जाने वाले लेखक ने नहीं की होगी। वह किताब नेहरु को उनकी विराट छवि से अलग हटकर एक सामान्य मनुष्य के रूप में देखती है। यही हाल जयराम रमेश की किताब 'इंदिरा गांधी: प्रकृति में एक जीवन' का हुआ। अर्थशास्त्री, प्रखर नेता और सोनिया गांधी के भाषण लेखक जयराम रमेश की इस किताब में ऐसा क्या होगा? जब यह किताब अंग्रेज़ी में आई तभी मुझे एक 'कांग्रेस संदेश' की ओर से रिव्यू के लिए दी गई थी। लेकिन मैं अपने मन के उहापोहों के कारण टाल गया। इधर जब ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से इसका हिंदी अनुवाद देखा तो सोचा पढ़ा जाए। आजकल पर्यावरण को लेकर, प्रकृति को लेकर बहुत चिंता व्यक्त की जा रही है। मैंने सोचा कि किताब पढ़कर देखा जाए, अच्छी नहीं लगी तो किताब को बंद करने का विकल्प हमेशा पास में रहता है। किताब की भूमिका पढ़ते ही धारणा बदल गई। इंदिरा गांधी की एक अलग ही छवि यह किताब प्रस्तुत करती है। आयरन लेडी, शेरनी या इमरजेंसी लगाने वाली तानाशाह से एक अलग ही छवि। सोलह साल तक देश की प्रधानमंत्री रहने वाली इंदिरा गांधी केवल प्रकृति से प्यार ही नहीं करती थीं बल्कि प्रकृति को भविष्य के लिए बचाए जाने की ज़रूरत है- प्रधानमंत्री के रूप में इस सोच को भी उन्होंने ठोस योजनाओं का रूप दिया। वन संरक्षण, राष्ट्रीय अभयारण्य से लेकर प्रोजेक्ट टाइगर उनकी योजनाओं का हिस्सा थी।लेखक ने बड़े विस्तार से उनके जुड़े काग़ज़ातों और उनके पत्रों एक माध्यम से इस किताब में पशु-पक्षी, प्रकृति से प्यार करने वाली इंदिरा का के व्यक्तित्व का एक अलग ही रूप दिखाया है।
अपनी हत्या से पहले उनकी अंतिम यात्रा भुवनेश्वर की थी, जहाँ उन्होंने अपना वह ऐतिहासिक भाषण दिया था जिससे यह लगता रहा कि उनको अपनी मृत्यु का पूर्वाभास हो गया था। उससे ठीक पहले वह कश्मीर की यात्रा पर गई थीं, और अपने पोते-पोती के साथ चिनार के बाग़ों की सैर भी की थी। संयोग से जिस अंतिम किताब की उन्होंने भूमिका लिखी थी वह भी प्रकृति से जुड़ी किताब थी। किताब पढ़ते हुए प्रसिद्ध अर्थशास्त्री पी सी जोशी का वह लेख याद आ गया जो उन्होंने नेहरु के कुमाऊँ प्रेम को लेकर लिखा था। उसको पढ़कर मेरे अंदर कुमाऊँ के लिए ऐसा प्यार जागा कि आज भी समय मिलने पर सबसे पहले कुमाऊँ जाने के बारे में ही सोचता हूँ। हालाँकि जयराम रमेश की यह किताब उस पाए की नहीं लगी। अर्थशास्त्री आँकड़ों का बाज़ीगर होता है और लेखक जयराम रमेश ने इतने तथ्य जुटा दिए हैं कि उनके शोध को देखकर हैरानी होती। हाँ, 360 पेज की किताब अनुपात से कुछ अधिक बड़ी हो गई है, कुछ हद तक उबाऊ भी। लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि अपनी तरह की अनूठी किताब है।
बस अंत में एक बात और, माना कि  यह कमल फूल का दौर है लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि डैफोडिल्स का अनुवाद कमल कर दिया जाए। वैसे किताब का अनुवाद प्रवाहपूर्ण है और किताब के रस को बनाए रखता है। अनुवादक अंचित पांडेय इसके लिए धन्यवाद के पात्र हैं।
-प्रभात रंजन

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