राजीव दीक्षित एवं एस.पी. सिंह
कृषि विज्ञान केन्द्र, रायगढ़ (छ.ग.)
मेथी मनुष्य की जानकारी में आने वाली प्रमुख मसाला फसलों में से एक मसाला फसल है। प्राचीन काल में मिस्रवासी इसका उपयोग भोजन, दवा और लेप बनाने वाले वस्तु के रुप में करते थे। मेथी का उद्भव स्थान दक्षिण पूर्वी यूरोप तथा पश्चिमी एशिया है। वहां से इसका विस्तार भारत, अर्जन्टीना तथा भूमध्य सागरतटीय देशों में हुआ। भारत में इसकी खेती व्यावसायिक /वाणिज्यिक स्तर पर राजस्थान, मध्यप्रदे ।। गुजरात, उत्तरप्रदेश, पंजाब तथा छत्तीसगढ़ राज्यों में की जाती है। भारत मेथी का मुख्य उत्पादक तथा निर्यातक देश है। यह बहुद्देशीय फसल है, जिसका उपयोग सब्जी तथा मसाले दोनों ही रूपों में किया जाता है।
मेथी एक वर्षीय शाकीय पौधा है, जिसकी ऊँचाई 30 से. मी. से 60 से.मी. होती है। इसकी दो प्रजातियाँ होती हैं- ट्राइगोनेल्ला फोइनम ग्रेइकम या सामान्य मेथी तथा ट्राइगोनेल्ला कोरनीकुलाटा या कसूरी /चंपा मेथी।
सामान्य मेथी का उत्पादन पूरे देश में किया जाता है परन्तु कसूरी मेथी ठण्डे उतरी-पर्वी व पश्चिमी क्षेत्रों के लिए उपयुक्त होती है। ये दोनों उपज तथा बढ़वार में एक दूसरे से भिन्न होती है। सामान्य मेथी की पत्तियाँ गहरी होती है तथा 2-3 छोटे सफेद रंग के फूल निकलते हैं| फलियों का रंग पकने पर हल्का भूरा या पीला तथा आकार चोंच जैसा होता है। जिसमें 8-15 पीले भूरे दाने होते हैं। कसूरी मेथी की वृद्धि धीमी होती है। इसके फूल नारंगी या पीले रंग के, फलियाँ छोटी और हँसिये के आकार की होती हैं।
यह ठंडे मौसम की फसल है। बीज उत्पादन हेतु शुष्क व अधिक तापमान की आवश्यकता होती हैं। अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में इसकी वृद्धि अच्छी नहीं होती। पाला/तुषार सहने की अच्छी क्षमता वाली फसल है। अच्छी वानस्पतिक वृद्धि के लिए प्रारंभिक अवस्था में पौधों को ठंडे व कम तापमान वाले मौसम की आवश्यकता होती है।
खेत की तैयारी - बुवाई से पहले 2-3 बार खेत की अच्छी तरह जुताई करके मिटटी भुरभुरी कर लेनी चाहिए। अंतिम जुताई से पूर्व सडी हुई गोबर की खाद अनुशंसित मात्रा में भूमि में मिला देना चाहिए तत्पश्चात, बराबर आकार की क्यारियाँ अनुशंसित दूरी पर बना लेनी चाहिए। 15-20 किग्रा. बीज एक हेक्टेयर क्षेत्र के लिए पर्याप्त होता है। बीजों के अंकुरण में 6-8 दिन का समय लगता है। बुवाई पूर्व बीजों का राइजोबियम कल्चर से बीजोपचारित करना लाभप्रद होता है।
बुवाई हेतु अक्टूबर के तीसरे सप्ताह से नवंबर के दूसरे सप्ताह तक का समय उचित होता है। हालांकि पत्ते वाली सब्जी के लिए सामान्य मेथी की बुवाई सितम्बर के मध्य से मार्च के मध्य तक की जाती है। बुवाई के लिए सबसे अच्छा समय नवंबर का प्रथम पखवाड़ा होता हैं। सामान्यतया बीज की छिटकवाँ विधि से बुवाई की जाती है किन्तु कतार पद्धति से बुवाई करने पर 15-20 से.मी. की दूरी पर कतारों में एवं 40 से मी पौध से पौध की दूरी रखते हुए बुवाई की जानी चाहिए ताकि पौधों की वृद्धि के प्रारंभिक अवस्था में निराई गुडाई करने में सुविधा होती है।
खेत की तैयारी के समय 10-15 टन कार्बनिक खाद या कम्पोस्ट प्रति हेक्टेयर की दर से मिट्टी में मिलायें। 40 किग्रा. नत्रजन, 20 कि.ग्रा. फास्फोरस एवं 20 किलो पोटा प्रति हेक्टेयर की दर से उपयोग करें। जब पौधे 3-4 पत्तों वाले हो जायें, तब ज्यादा घने पौधों को निकाल दें, जिससे कतारों में पौधों की दूरी 8-10 से.मी. हो जाये। पौधों के वृद्धि की प्राथमिक अवस्था में निराई-गुड़ाई करने से मृदा में पूर्ण रूप से वायु संचार होता है तथा खरपतवार रोकने में मदद मिलती है। बुवाई से 45-50 दिन बाद दूसरी निराई करके खरपतवार निकाल दें।
मृदा तथा जलवायु की दशा के अनुसार 4-6 दिन के अन्तर पर सिंचाई करनी चाहिए। बुवाई से पूर्व पलेवा करके खेत तैयार करने पर बीजों का अंकुरण बहुत अच्छा होता है तथा इसके बाद आवश्यकतानुसार सिंचाई करें।
कटाई : कसूरी सलेक्शन किस्म, जिसमें फूल देरी से आते है की पहली कटाई बुवाई के 25-30 दिन बाद हरी पत्तियों हेतु की जाती है
तत्पश्चात 15 से 25 दिन के अंतराल में फूल आने के पूर्व तक कटाई कर सब्जी प्राप्त कर सकते हैं। अधिक अन्तराल होने पर पत्तियों में कड़वापन आ जाता है।
सामान्य मेथी में तुडाई 2 और 3 पत्तियाँ आने के बाद से भुरू हो जाती है। बुवाई के 20 से 25 दिन बाद पहली तुडाई जमीन की सतह से पौधे को तोड़ कर कर सकते हैं पर 30-35 दिन का होने पर खींच कर बाहर निकालना पड़ता है। बीजोत्पादन हेतु मेथी फसल में फूल आने से पूर्व दो तुडाई ले कर पौधों को फूलने-फलने हेतु छोड दिया जाता है। पकने के बाद फसल की कटाई कर ली जाती है। ज्यादा पकने पर कटाई करने से बीजो के खेत में बिखरने का, जबकि पूर्ण पकने से पूर्व कटाई करने से बीजों के सिकुड़ने की समस्या उत्पन्न होती है। पकने के समय पर, ऊपरी पत्तियों को छोडकर सभी निचली पत्तियाँ पीली पड़ कर गिर जाती हैं जो फसल के पकने की मुख्य पहचान है। कटाई के बाद पौधों को सूर्य की रौशनी में सूखने के लिए छोड़ देते है। सूखे हुए पौधों की मड़ाई तथा ओसाई करके बीज अलग कर देते हैं।
प्रति वर्गमीटर क्षेत्रफल में लगभग 3 से 5 किलोग्राम तक हरी पत्तियों की उपज प्राप्त होती है। सामान्य मेथी में 70 से 80 क्विंटल प्रति हेक्टेयर एवं कसूरी मेथी में 90 से 100 क्विंटल प्रति हेक्टेयर हरी पत्त्तियों की उपज प्राप्त होती है तथा दानों की उपज किस्मों पर निर्भर करती है जो औसतन 10 से 15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है।
