देश में मानसिक रुप से बीमार लोगों की संख्या चिंताजनक रुप से बढ़ती जा रही है। आईसीएमआर और पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में करीब 19.73 करोड़ लोग किसी न किसी प्रकार की मानसिक बीमारी के शिकार हैं। इनमें डिप्रेशन और एंजाइटी के मामले सबसे ज्यादा है। आईसीएमआर ने 1990 से 2017 तक मानसिक विकारों के ट्रेंड पर किए गए अध्ययन में यह खुलासा हुआ है।
इसके अलावा सिजोफ्रेनिया, बायोपोलर डिसआर्डर, इंडियोपैथिक, आटिज्म और इंटेलेक्चुअल डिसएबिलिटी के मामले भी बढ़ रहे है। यह संख्या पूरी आबादी की 14.3 फीसदी है जो किसी भी देश के लिए चिंता की वजह हो सकती है। इनमें 4.57 करोड़ लोग अवसाद और 4.49 करोड़ लोग किसी न किसी बात की चिंता यानि एंजाइटी के शिकार है। रिपोर्ट में ये भी बताया गया है कि इन बीमारियों का प्रसार भारत में बढ़ रहा है।
आईसीएमआर की एक रिपोर्ट ग्लोबल बर्डेन ऑफ डिसीज स्टडी 2017 में दावा किया गया है कि कुल मानसिक बीमारियों में डिप्रेशन या मानसिक अवसाद की भूमिका सबसे ज्यादा है। यह लगभग 33.8 फीसदी है। इसके बाद 19 फीसदी आंकड़े के साथ एंजाइटी दूसरी सबसे बड़ी मानसिक समस्या है जो लोगों को परेशान कर रही है। बौद्धिक दिव्यांगता के भी 10.8 फीसदी मरीज इसका बड़ा हिस्सा हैं।
वहीं सीजोफ्रेनिया के 9.8 फीसदी मरीज मानसिक बीमारी के शिकार बताए गए हैं। अय्धयन में ये भी बात सामने आई है कि अधे़ड़ लोग डिप्रेशन से ज्यादा पीड़ित है, जो भारत में बुढ़ापे की तरफ बढ़ती आबादी को लेकर चिंता को दिखाती है। साथ ही इसमें कहा गया है कि अवसाद का संबंध भारत में आत्महत्या के कारण होने वाली मौतों से भी है। बचपन में ही मानसिक विकार की गिरफ्त में आनेवाली उत्तरी राज्यों में संख्या अधिक है।
आत्महत्या और मानसिक बीमारी के बीच सीधा संबंध पाया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक मानसिक बीमार लोग आत्महत्या के ज्यादा प्रयास करते हैं। रिपोर्ट में यह भी पाया गया है कि मानसिक रुप से बीमार महिलाएं पुरुषों की तुलना में आत्महत्या के ज्यादा प्रयास करती हैं। अध्ययन में यह भी पाया गया है कि महिलाओं में डिप्रेशन, एंजाइटी और खाने के विकार ज्यादा पाए गए हैं।
क्यों इलाज नहीं कराते लोग ?
आईसीएमआर के महानिदेशक डॉ. बलराम भार्गव ने रिपोर्ट जारी करने के मौके पर कहा कि मानसिक बीमारी किसी भी दूसरी सामान्य बीमारियों की तरह का एक शारीरिक विकार है जिसे उचित इलाज के जरिए दूर किया जा सकता है। विभिन्न कारणों से यह किसी भी स्वस्थ व्यक्ति को अपनी चपेट में ले सकती है। लेकिन जागरुकता की कमी के कारण मानसिक बीमारी को लोग पागलपन से जोड़कर देखते हैं।
इसी डर से इलाज कराने से भी बचते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि अगर एक बार मानसिक बीमारी का इलाज करवाया जाए तो लोग उन्हें पागल समझने लगेंगे। उन्होंने कहा कि लोगों को इस भ्रांति से बचने के साथ-साथ किसी भी प्रकार की मानसिक समस्या होने पर अच्छे मनोचिकित्सक से संपर्क करना चाहिए।
नितेन्द्र सिंह
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मंगलवार, 24 दिसंबर 2019
गुरुवार, 19 दिसंबर 2019
विशेष लेख : छत्तीसगढ़ जीवन्त सांस्कृतिक परंपराओं से संपन्न राज्य
- सी.एल. तिवारी
छत्तीसगढ़ राज्य जीवन्त सांस्कृतिक परंपराओं से संपन्न है। राज्य सरकार ने एक वर्ष में यहां की संस्कृति और परम्पराओं की पहचान के लिए कई अहम फैसले लिए हैं । जिसमें अरपा पैरी की धार गीत को राज्य गीत घोषित किया जाना शामिल है । अब सभी सरकारी कार्यक्रमों और आयोजनों की शुरूआत राज्य गीत से करने निर्णय लिया गया है । राज्य शासन द्वारा 27 से 29 दिसम्बर तक राजधानी रायपुर में राष्ट्रीय आदिवासी नृत्य महोत्सव का आयोजन किया गया है । इस महोत्सव ने अब अन्तर्राष्ट्रीय आयोजन का स्वरूप ले लिया है । इसमें देश के अन्य राज्यों के साथ-साथ युगांडा, मालदीव, थाइलैण्ड, श्रीलंका, बेलारूस और बांग्लादेश के प्रतिनिधियों और लोक कलाकारों ने आने की सहमति जताई है । इस महोत्सव के माध्यम से छत्तीसगढ़ की पहचान विदेशों में पहुंचेगी। राज्य सरकार ने राजिम कुंभ कल्प मेला अधिनियम 2006 में संशोधन करते हुए ‘छत्तीसगढ़ राजिम कुंभ मेला‘ का नाम परिवर्तन कर उसका प्राचीन नाम‘राजिम माघी पुन्नी मेला‘ करके मूल स्वरूप में ला दिया है। इस वर्ष राजिम माघी पुन्न्नी मेला के अवसर पर प्रदेश के 241 लोक कलाकार दलों को मंच प्रदान किया गया है, जिसमें लगभग 6 हजार से अधिक कलाकारों ने अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर लोगों का मनोरंजन किया। साथ ही पारंपरिक लोक खेलों एवं प्रतियोगिता में ग्रामीण अंचल के बच्चों ने बड़े उत्साह से भाग लिया। इससे स्थानीय कलाकारों को काम मिला और साथ ही उनका मान और मनोबल बढ़ा है। राजधानी के साईंस कालेज परिसर में एक से पांच नवम्बर तक आयोजित राज्योत्सव में छत्तीसगढ़ के लोक कलाकारों को सांस्क्रतिक कार्यक्रमों के लिए अवसर दिया गया। छत्तीसगढ़ केे कलाकारों को बढ़ावा देने राज्य सरकार का यह ठोस कदम है।
छत्तीसगढ़ में हरेली, तीजा-पोरा जैसे पारंपरिक त्यौहारों को प्रमुखता दी गई और हरेली, तीजा, विश्व आदिवासी दिवस एवं छठ पूजा के लिए नए सार्वजनिक अवकाश की घोषणा की गई । दीपावली के दूसरे दिन गोवर्धन पूजा को भी सार्वजनिक अवकाश देने की घोषणा की गई है । छत्तीसगढ़ी राज भाषा का सामान्य काम काज में उपयोग को बढ़ावा देने के लिए छत्तीसढ़ विधान सभा में एक दिन की कार्यवाही केवल छत्तीसगढ़ी भाषा में की गई ।
राज्य के कलाकारों और साहित्यकारों अथवा उनके परिवार के सदस्यों की लंबी गंभीर बीमारी, दुर्घटना, मृत्यु अथवा प्राकृतिक आपदा की स्थिति में 29 साहित्यकार, कलाकारों को आर्थिक मदद दी गई। जगदलपुर के आसना में बस्तर लोकनृत्य और साहित्य अकादमी की स्थापना की जाएगी। कांकेर गढ़िया पहाड़ के सौन्दर्यीकरण के लिए 2 करोड़ तथा गढ़िया महोत्सव के लिए प्रतिवर्ष 5 लाख देने का निर्णय लिया गया। रामवन तथा माता कौशल्या मंदिर को पर्यटन और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से विकसित किया जाएगा। बस्तर में आदिवासी संग्रहालय की स्थापना की जाएगी।
छत्तीसगढ़ की जनजातीय एवं लोक संस्कृति की परंपरा की पहचान के लिए निरंतर पहल की जा रही है। विभिन्न कला रूपों के प्रदर्शन हेतु राज्य में एवं अन्य प्रदेशों में भी सांस्कृतिक कार्यक्रम की प्रस्तुति की व्यवस्था की जाती है। पारंपरिक उत्सवों, अशासकीय संस्थाओं को आर्थिक सहायता प्रदान कर सांस्कृतिक गतिविधियों को प्रोत्साहित किया जा रहा है। कबीर जयंती के अवसर पर पहली बार पूरे राज्य में ख्याति प्राप्त कबीर भजन गायकों का कार्यक्रम रायपुर, बिलासपुर, बेमेतरा एवं भिलाई-दुर्ग में आयोजित कराया गया। विभिन्न जिलों व कस्बों में मेला, महोत्सव, लोक मड़ई, कृषि मेला आदि का आयोजन कर छत्तीसगढ़ के ग्रामीण लोक जीवन व खेती-किसानी से संबंधित कई महत्वपूर्ण जानकारी दी गई।
जगार 2019 के अवसर पर छत्तीसगढ़ हाट परिसर पण्डरी रायपुर में छत्तीसगढ़ के विभिन्न विधाओं के कुल 21 लोक कलाकार दलों द्वारा 10 दिवसीय सांस्कृतिक कार्यक्रम की प्रस्तुति दी गई। क्षेत्रीय सरस मेला के अवसर पर साइंस कॉलेज परिसर रायपुर में प्रदेश के 07 लोक कलाकार दलों को सांस्कृतिक कार्यक्रम हेतु मंच प्रदान किया गया। पद्मश्री पुनाराम निषाद की पुण्यतिथि के अवसर पर रिंगनी दुर्ग में लोक कलाकार दल द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। पुताला-नागपुर में आयोजित राष्ट्रीय आदिवासी महोत्सव के अवसर पर छत्तीसगढ़ के लोक कलाकारों ने संस्कृति कला के आदान-प्रदान में भाग लिया। बेमेतरा में कृषि विकास एवं किसान कल्याण मेला के अवसर पर प्रदेश के कुल 07 लोक कलाकार दलों द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्र्रम की प्रस्तुति दी गई। हॉर्टलैण्ड स्टोरिज भोपाल में आयोजित भोपाल साहित्य एवं कला महोत्सव के अवसर पर छत्तीसगढ़ की संस्कृति के आदान-प्रदान हेतु बस्तर बैण्ड के लोक कलाकार दल द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम में सहभागिता रही।
भोरमदेव महोत्सव, गनियारी लोक कला महोत्सव, कर्णेश्वर महादेव मेला महोत्सव, रतनपुर में माघी पूर्णिमा एवं आदिवासी विकास मेला, संत समागम महामेला दामाखेड़ा, मल्हार महोत्सव, शिवरीनारायण मेला महोत्सव तथा लोक मड़ई महोत्सव राजनांदगांव आदि के आयोजन हेतु संबंधित जिला प्रशासन को राशि का आबंटन दिया गया। सहपीडिया द्वारा छत्तीसगढ़ में गांधी विषयक माड्यूल सहित राज्य की संस्कृति पर केन्द्रित 15 इंटरनेट माड्यूल का लोकार्पण किया गया। भारत सरकार की योजना ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ के अंतर्गत अंतर्राष्ट्रीय काईट फेस्टिवल 2019 06 से 14 जनवरी में गुजरात के अहमदाबाद में छत्तीसगढ़ी सांस्कृतिक कार्यक्रम की प्रस्तुति दी गई एवं छत्तीसगढ़ी व्यंजन स्टाल लगाया गया।
महात्मा गांधी के 150वीं वर्षगांठ एवं मुंशी प्रेमचंद के जयंती के अवसर पर नाटक ‘पंच परमेश्वर’ प्रस्तुत किया गया। 02 एवं 03 अक्टूबर 2019 को छत्तीसगढ़ विधान सभा परिसर में पद्मश्री भारती बंधु रायपुर द्वारा कबीर गायन, पद्मविभूषण श्रीमती तीजन बाई द्वारा पंडवानी प्रस्तुति और ‘कस्तूरबा के गांधी’ नाटक की प्रस्तुति एवं पं. रामदयाल तिवारी के ग्रंथ ‘गांधी मीमांसा’ के लघु विशेष संस्करण का विमोचन हुआ। 03 अक्टूबर को संस्कृति भवन मुक्ताकाशी मंच रायपुर में ‘ऐसे थे बापू’ नाटक की प्रस्तुति दी गई। 04 से 10 अक्टूबर 2019 तक कंडेल, धमतरी से गांधी मैदान रायपुर तक गांधी विचार पदयात्रा का आयोजन किया गया।
15 अगस्त 2019 को महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय रायपुर परिसर में महात्मा गांधी की प्रतिमा की प्रतिष्ठा एवं अनावरण तथा गांधी जी के प्रिय भजन एवं देशप्रेम गीतों की प्रस्तुति दी गई। ‘आजादी का सफरनामा’ और ‘मंगल से महात्मा’ नाटकों की मंचीय प्रस्तुति हुई। भारत रत्न पूर्व प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी के 75वीं जयंती के अवसर पर आयोजित स्मरणांजलि कार्यक्रम में महात्मा गांधी के प्रिय भजनों की संगीतिक प्रस्तुति दी गई। ‘‘गांधी जी की छवि’’ कार्यक्रम के अंतर्गत उनके कार्य, विचार और गांधीदर्शन से संबंधित चलचित्रों के अंश का प्रदर्शन और व्याख्यान का आयोजन किया गया।
सोमवार, 16 दिसंबर 2019
विशेष लेख : छत्तीसगढ़ में जागी पुरखों के सपने पूरे होने की आस
- धान और किसान से चलती है राज्य की अर्थव्यवस्था
- मंत्रिमंडल ने एक वर्ष में लिए कई अहम फैसले
रायपुर 16 दिसम्बर 2019 / शपथ लेने के मात्र दो घंटे में ही नई सरकार ने कई बड़े फैसले लेकर सबको चाैंका दिया। दरअसल धान और किसान ऐसे विषय हैं जिसका यहां के घर-घर से ताल्लुक है। पिछले एक साल के कार्यकाल को देखें तो राज्य सरकार ने राज्य की अर्थव्यवस्था को देशव्यापी मंदी के प्रभाव से बचाए रख कर बड़ी कामयाबी हासिल की है। नई सरकार ने देश की सबसे बड़ी स्वास्थ्य योजना शुरू की है जिसमें इलाज के लिए 20 लाख रूपए तक की सहायता दी जाएगी। इसके अलावा 56 लाख लोगों के लिए डॉ. खूबचंद बघेल स्वास्थ्य सहायता योजना, सार्वभौम पीड़ीएस, कर्जमाफी, 25 सौ रूपए में धान खरीदी, 46 लाख लोगों को बिजली बिल हाफ सहित प्रदेश की जनता के लिए अनेक निर्णय लिए गए हैं। छत्तीसगढ़ लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप काम करने वाले मीडिया प्रतिनिधियों के लिए देश में पहली बार पत्रकार सुरक्षा कानून लाने के लिए पहल की गई है। साथ ही राज्य में संचालित वरिष्ठ मीडियाकर्मी सम्मान निधि को और अधिक अनुकूल बनाया गया है।
मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के नेतृत्व में मंत्रिमंडल द्वारा गढ़बो नवा छत्तीसगढ़ के लिए पुरखों के संकल्प को पूरा करने की दिशा में लगातार फैसले लिए जा रहे हैं। छत्तीसगढ़ की संस्कृति को राज्य सरकार द्वारा प्रोत्साहन दिया जा रहा है। अरपा पैरी के धार को राज्योत्सव के मौके पर राज गीत का दर्जा दिया गया है। वहीं यहां की संस्कृति तीज-त्योहारों पर लोगों को अपनी संस्कृति पर गर्व करने का संदेश दिया जा रहा है। इसी कड़ी में छत्तीसगढ़ी त्योहारों में अवकाश घोषित कर इन त्योहारों का मान बढ़ाया गया है। मंत्रिपरिषद ने डॉ. नरेन्द्र वर्मा द्वारा लिखित छत्तीसगढ़ी गीत-‘‘अरपा पइरी के धार महानदी हे अपार‘......को राज्य-गीत घोषित किया इसे सभी शासकीय कार्यक्रमों और आयोजनों में गाया जा रहा है। श्रीराम वनगमन पथ के महत्वपूर्ण स्थलों को पर्यटन की दृष्टि से विकसित करने का निर्णय लिया गया। शासकीय नौकरियों और शैक्षणिक सेवाओं में अनुसूचित जाति वर्ग का आरक्षण 12 प्रतिशत से बढ़ाकर 13 प्रतिशत एवं अन्य पिछड़ा वर्ग का आरक्षण 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने का निर्णय भी लिया गया। इसके अलावा आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण करने का निर्णय लिया गया।
छत्तीसगढ़ में देश में सबसे बड़ी स्वास्थ्य योजना शुरू की है, जिसमें 20 लाख रूपए तक के इलाज की सुविधा मिलेगी। राज्य के 56 लाख लोगों को बीमा कव्हर दिलाने के लिए मंत्री परिषद ने डॉ. खूबचंद बघेल स्वास्थ्य सहायता योजना शुरू करने का निर्णय लिया है। 15 नवंबर को मंत्री परिषद की बैठक में यह निर्णय लिया गया कि राज्य में संचालित सभी योजनाओं को समाहित कर डॉ. खूब चंद बघेल के नाम पर नई स्वास्थ्य योजना शुरू की जाएगी। इस नई योजना में सभी प्राथमिक एवं अंत्योदय राशन कार्डधारी परिवारों को विभिन्न बीमारियों के इलाज के लिए 5 लाख रूपए तक के इलाज की सुविधा दी जाएगी। साथ ही एवं अन्य राशन कार्डधारी परिवारों को 50 हजार रूपए तक इलाज की सुविधा मिलेगी। यह योजना ट्रस्ट मोड पर संचालित की जाएगी। गंभीर बीमारियों में लगने वाले खर्च को देखते हुए मुख्यमंत्री विशेष स्वास्थ्य सहायता योजना शुरू करने का निर्णय लिया गया। इसमें उन गंभीर बीमारियों को कव्हर किया जाएगा जो डॉ.खूब चंद बघेल स्वास्थ्य सहायता योजना में शामिल नहीं हैं। इस येाजना में 5 लाख रूपए से अधिकतम 20 लाख रूपए तक के इलाज की सुविधा दी जाएगी।
राज्य में उद्यानिकी शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए राजधानी के पास पाटन में महात्मा गांधी के नाम पर उद्यानिकी ओर वानिकी विश्वविद्यालय की स्थापना का निर्णय लिया गया है। इससे इस कृषि आधारित राज्य में किसानों को उद्यानिकी फसलों से जोड़ा जा सकेगा। इससे यहां उद्यानिकी के क्षेत्र में शोध और यहां के युवाओं को कृषि के क्षेत्र में एग्री बिजनेस में स्टार्ट-अप शुरू करने का मौका मिलेगा। रायगढ़ में स्व. श्री नंद कुमार पटेल के नाम पर नया विश्वविद्यालय प्रारंभ करने का निर्णय भी लिया गया है। शिक्षा के अधिकार के अंतर्गत अभी तक केवल कक्षा आठवीं तक के छात्र-छात्राओं के लिए निःशुल्क शिक्षा एवं पाठ्य पुस्तक की व्यवस्था की जाती है। अब यह सुविधा कक्षा नवमी से बारहवीं तक के विद्यार्थियों को भी उपलब्ध करायी जाएगी।
वनांचल क्षेत्रों में रहने वाले खनिज प्रभावित क्षेत्रों के लोगों के जीवन में बदलाव के लिए डी.एम.एफ की राशि का उपयोग करने के लिए मंत्रिपरिषद में निर्णय लिया। उन्होंने किसानों से धान खरीदी और कर्ज माफी को सर्वाधिक महत्वपूर्ण मानते हुए शपथ लेते ही 25 सौ रूपए में धान खरीदी और कर्ज माफी की घोषणा की। मंत्रिमंडल की प्रथम बैठक में इस संबंध में निर्णय लिया गया और लगभग 12 हजार करोड़ रूपए की कर्ज माफी का मार्ग प्रशस्त हुआ। नई सरकार ने माना कि धान खरीदी का मुद्दा किसानों और राज्य के स्वाभिमान से जुड़ा हुआ है, इसलिए मंत्रिमंडल की बैठक में 32 लाख मीटरिक टन चांवल की खरीदी के लिए केन्द्र सरकार से न केवल अनुरोध किया बल्कि 2500 रूपए में धान खरीदी की अनुमति देने का आग्रह किया।
राज्य में फैले कुपोषण और पलायन के मद्देनजर लोगों को खाद्य सुरक्षा देने का फैसला लिया गया। यह फैसला इस मायने महत्वपूर्ण है कि यह बिना किसी भेदभाव के लागू होगा। सार्वभौम पीडी.एस लागू कर 65 लाख परिवारों को खाद्यान्न सुरक्षा का लाभ मिल रहा है। इससे जनघोषणा पत्र का एक बड़ा वायदा पूरा हुआ है। योजना में तीन से पांच सदस्यीय परिवारों को 35 किलो खाद्यान्न मिल रहा है। बस्तर अंचल में चने के साथ-साथ अब बस्तर संभाग के जिलों में प्रति परिवार दो किलो गुड़ का निःशुल्क वितरण करने, गन्ना उत्पादक कृषकों के व्यापक हित एवं सहकारी शक्कर कारखानों को सक्षम बनाने की दृष्टि से सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से वितरित किए जाने वाले शक्कर का क्रय राज्य के सहकारी शक्कर कारखानों से करने का निर्णय।
राज्य में उद्योग और व्यापार को बढ़ावा देने के लिए नई उद्योग नीति की राज्योत्सव पर जारी की गई । इसमें कृषि और वनोपज धारित उद्योगों की स्थापना को प्राथमिकता दी गई है। औद्योगिक एवं आर्थिक मंदी से स्टील उद्योगों को उबारने के लिए घोषित विशेष राहत पैकेज की अवधि बढाने, बायो-एथेनॉल उत्पादन संयंत्र की स्थापना को प्रोत्साहन दिया गया है। आपसी सहमति से ग्रामीण क्षेत्रों में अर्जित की जाने वाली भूमि एवं उस भूमि पर स्थित अचल परिसंपत्तियों के मूल्य की मुआवजा राशि को दो गुना से बढ़ाकर 4 गुना किया गया है। मध्य भारत का प्रमुख औद्योगिक और व्यापारिक नगर और प्रदेश की राजधानी रायपुर में सराफा कारोबार व्यापार और वाणिज्यिक गतिविधियों में तेजी लाने के लिए जेम एण्ड ज्वेलरी पार्क रायपुर शहर में स्थापित करने का निर्णय लिया गया।
वनांचल में आदिवासियों की जमीन वापसी कर छत्तीसगढ़ में देश में एक उदाहरण प्रस्तुत किया है। उद्योग नहीं लगने की स्थिति में 1700 किसानों की 42 सौ एकड़ जमीन वापसी का फैसला भी मंत्रिमंडल ने लिया। यह जमीन टाटा के इस्पात संयत्र के लिए अधिग्रहित की गई थी। वनांचल क्षेत्र के युवाओं को रोजगार दिलाने पांचवी अनुसूचित क्षेत्र सरगुजा एवं बस्तर संभाग के साथ-साथ कोरबा जिले में तृृतीय एवं चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों की जिला कैडर में भर्ती की अवधि को दो वर्ष बढ़ाने का निर्णय लिया गया। शासकीय विभागों में सीधी भर्ती से भरे जाने वाले पदों के लिए निर्धारित अधिकतम आयु सीमा में राज्य के स्थानीय निवासी अभ्यर्थियों को अधिकतम 5 वर्ष की छूट दिया गया।
वनांचल क्षेत्रों में रहने वाले खनिज प्रभावित क्षेत्रों के लोगों के जीवन में बदलाव के लिए डी.एम.एफ की राशि का उपयोग करने के लिए मंत्रीपरिषद में निर्णय लिया। छत्तीसगढ़ जिला खनिज संस्थान न्यास नियम, 2015 में संशोधन किया गया इसमें खनिज प्रभावित क्षेत्रों में शिक्षा पोषण सहित उनके जरूरत के हिसाब से डी.एम.एफ की राशि का उपयोग करने का निर्णय लिया गया। इसके लिए प्रभारी मंत्री की अध्यक्षता में गवर्निंग बाड़ी बनाने और इसमें विधायकों को सदस्य नियुक्त करने का निर्णय लिया गया। गौण खनिज साधारण रेत के उत्खनन के लिए अब कलेक्टर के माध्यम से नीलामी के द्वारा रेत खदानों का पट्टा आवंटन किया जाएगा। विशेष पिछड़ी जनजाति समूह के अभ्यर्थियों को सहायक शिक्षक एवं सहायक ग्रेड-3 के पदों पर संपूर्ण प्रदेश में सीधी भर्ती करने, बस्तर एवं सरगुजा में विशेष कनिष्ठ कर्मचारी चयन बोर्ड के गठन का अनुमोदन किया गया।
राज्य में आर्थिक क्रिया कलापों में तेजी लाने के लिए संपूर्ण प्रदेश में अचल संपत्ति के बाजार मूल्य गाइडलाईन की दरों में 30 प्रतिशत की कमी तथा पंजीयन शुल्क 0.8 प्रतिशत से बढ़ाकर गाइडलाईन मूल्य का 4 प्रतिशत करने का निर्णय। इस निर्णय से रियल ईस्टेट बाजार में तेजी आयी है। नगरीय क्षेत्र में डायवर्सन प्रकिया के सरलीकरण,सभी 168 नगरीय निकायों में परम्परागत रूप से काम करने वाले स्थानीय बेरोजगारों को आजीविका के साधन उपलब्ध कराने के लिए ‘पौनी पसारी‘ योजना प्रारंभ करने का निर्णय लिया गया। इसके तहत सभी नगरीय निकायों में परम्परागत व्यवसाय जैसे-लोहारी, कुम्हारी, कोष्टा, बंसोड़ आदि के लिए चबूतरा एवं शेड निर्माण कर, उन्हें अस्थायी रूप से किराये पर उपलब्ध कराते हुए व्यवसाय करने की सुविधा दी जाएगी।
मंत्रिमंडल द्वारा झीरम घाटी घटना की जांच के लिए एसआईटी के गठन, शहीद वीर नारायण सिंह के वंशजों को पेंशन स्वीकृत करने, विशुद्ध रूप से राजनीतिक आंदोलनों से संबंधित प्रकरणों की वापसी, आबकारी ड्यूटी दरें बढ़ाने तथा 50 शराब दुकानंे बंद करने , छत्तीसगढ़ खेल विकास प्राधिकरण के गठन कर खेल अकादमी बनाने, बस्तर और सरगुजा के अतिरिक्त मध्य क्षेत्र विकास प्राधिकरण भी गठित करने, नगरीय क्षेत्रों के भूमिहीन व्यक्ति को दिए गए पट्टों को फ्री-होल्ड करने, चिटफंड कंपनियों के मामले में अभिकर्ताओं के विरूद्ध पंजीबद्ध प्रकरणों की वापसी एवं निवेशकों के धन वापसी, प्रदेश के कोरबा, कटघोरा, धरमजयगढ़ एवं सरगुजा वनमंडल क्षेत्र के अंतर्गत 1995.48 वर्ग किमी क्षेत्र में लेमरू हाथी रिजर्व गठित करने , नक्सल प्रभावित क्षेत्र अबूूझमाड़ क्षेत्र के 275 गांवों में राजस्व अभिलेख तैयार कराने सर्वे कराने, नगरीय निकायों मे ंमहापौर तथा अध्यक्षों का निर्वाचन अप्रत्यक्ष रूप से करने, छत्तीसगढ़ गृह निर्माण मण्डल की आवासीय और व्यावसायिक सम्पदा में 15 से 20 प्रतिशत छूट सहित विभिन्न छूट देने, सौर सुजला योजना फेज-4 के तहत 20,000 सोलर पंपों की स्थापना-इसमें इस वर्ष सुराजी गौठान में 4000 सोलर पंप स्थापित करने, वरिष्ठ मीडिया कर्मी सम्मान निधि अर्हता आयु 65 वर्ष से घटाकर 60 वर्ष और सम्मान निधि 5 वर्ष से बढ़ाकर आजीवन और देय राशि 5 हजार से बढ़ाकर 10 हजार रूपए करने का निर्णय लिया गया।
आलेख
श्री आनंद सोलंकी
श्री जी.एस. केशरवानी
रविवार, 15 दिसंबर 2019
मेथी उगायें व लाभ कमायें
राजीव दीक्षित एवं एस.पी. सिंह
कृषि विज्ञान केन्द्र, रायगढ़ (छ.ग.)
मेथी मनुष्य की जानकारी में आने वाली प्रमुख मसाला फसलों में से एक मसाला फसल है। प्राचीन काल में मिस्रवासी इसका उपयोग भोजन, दवा और लेप बनाने वाले वस्तु के रुप में करते थे। मेथी का उद्भव स्थान दक्षिण पूर्वी यूरोप तथा पश्चिमी एशिया है। वहां से इसका विस्तार भारत, अर्जन्टीना तथा भूमध्य सागरतटीय देशों में हुआ। भारत में इसकी खेती व्यावसायिक /वाणिज्यिक स्तर पर राजस्थान, मध्यप्रदे ।। गुजरात, उत्तरप्रदेश, पंजाब तथा छत्तीसगढ़ राज्यों में की जाती है। भारत मेथी का मुख्य उत्पादक तथा निर्यातक देश है। यह बहुद्देशीय फसल है, जिसका उपयोग सब्जी तथा मसाले दोनों ही रूपों में किया जाता है।
मेथी एक वर्षीय शाकीय पौधा है, जिसकी ऊँचाई 30 से. मी. से 60 से.मी. होती है। इसकी दो प्रजातियाँ होती हैं- ट्राइगोनेल्ला फोइनम ग्रेइकम या सामान्य मेथी तथा ट्राइगोनेल्ला कोरनीकुलाटा या कसूरी /चंपा मेथी।
सामान्य मेथी का उत्पादन पूरे देश में किया जाता है परन्तु कसूरी मेथी ठण्डे उतरी-पर्वी व पश्चिमी क्षेत्रों के लिए उपयुक्त होती है। ये दोनों उपज तथा बढ़वार में एक दूसरे से भिन्न होती है। सामान्य मेथी की पत्तियाँ गहरी होती है तथा 2-3 छोटे सफेद रंग के फूल निकलते हैं| फलियों का रंग पकने पर हल्का भूरा या पीला तथा आकार चोंच जैसा होता है। जिसमें 8-15 पीले भूरे दाने होते हैं। कसूरी मेथी की वृद्धि धीमी होती है। इसके फूल नारंगी या पीले रंग के, फलियाँ छोटी और हँसिये के आकार की होती हैं।
यह ठंडे मौसम की फसल है। बीज उत्पादन हेतु शुष्क व अधिक तापमान की आवश्यकता होती हैं। अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में इसकी वृद्धि अच्छी नहीं होती। पाला/तुषार सहने की अच्छी क्षमता वाली फसल है। अच्छी वानस्पतिक वृद्धि के लिए प्रारंभिक अवस्था में पौधों को ठंडे व कम तापमान वाले मौसम की आवश्यकता होती है।
खेत की तैयारी - बुवाई से पहले 2-3 बार खेत की अच्छी तरह जुताई करके मिटटी भुरभुरी कर लेनी चाहिए। अंतिम जुताई से पूर्व सडी हुई गोबर की खाद अनुशंसित मात्रा में भूमि में मिला देना चाहिए तत्पश्चात, बराबर आकार की क्यारियाँ अनुशंसित दूरी पर बना लेनी चाहिए। 15-20 किग्रा. बीज एक हेक्टेयर क्षेत्र के लिए पर्याप्त होता है। बीजों के अंकुरण में 6-8 दिन का समय लगता है। बुवाई पूर्व बीजों का राइजोबियम कल्चर से बीजोपचारित करना लाभप्रद होता है।
बुवाई हेतु अक्टूबर के तीसरे सप्ताह से नवंबर के दूसरे सप्ताह तक का समय उचित होता है। हालांकि पत्ते वाली सब्जी के लिए सामान्य मेथी की बुवाई सितम्बर के मध्य से मार्च के मध्य तक की जाती है। बुवाई के लिए सबसे अच्छा समय नवंबर का प्रथम पखवाड़ा होता हैं। सामान्यतया बीज की छिटकवाँ विधि से बुवाई की जाती है किन्तु कतार पद्धति से बुवाई करने पर 15-20 से.मी. की दूरी पर कतारों में एवं 40 से मी पौध से पौध की दूरी रखते हुए बुवाई की जानी चाहिए ताकि पौधों की वृद्धि के प्रारंभिक अवस्था में निराई गुडाई करने में सुविधा होती है।
खेत की तैयारी के समय 10-15 टन कार्बनिक खाद या कम्पोस्ट प्रति हेक्टेयर की दर से मिट्टी में मिलायें। 40 किग्रा. नत्रजन, 20 कि.ग्रा. फास्फोरस एवं 20 किलो पोटा प्रति हेक्टेयर की दर से उपयोग करें। जब पौधे 3-4 पत्तों वाले हो जायें, तब ज्यादा घने पौधों को निकाल दें, जिससे कतारों में पौधों की दूरी 8-10 से.मी. हो जाये। पौधों के वृद्धि की प्राथमिक अवस्था में निराई-गुड़ाई करने से मृदा में पूर्ण रूप से वायु संचार होता है तथा खरपतवार रोकने में मदद मिलती है। बुवाई से 45-50 दिन बाद दूसरी निराई करके खरपतवार निकाल दें।
मृदा तथा जलवायु की दशा के अनुसार 4-6 दिन के अन्तर पर सिंचाई करनी चाहिए। बुवाई से पूर्व पलेवा करके खेत तैयार करने पर बीजों का अंकुरण बहुत अच्छा होता है तथा इसके बाद आवश्यकतानुसार सिंचाई करें।
कटाई : कसूरी सलेक्शन किस्म, जिसमें फूल देरी से आते है की पहली कटाई बुवाई के 25-30 दिन बाद हरी पत्तियों हेतु की जाती है
तत्पश्चात 15 से 25 दिन के अंतराल में फूल आने के पूर्व तक कटाई कर सब्जी प्राप्त कर सकते हैं। अधिक अन्तराल होने पर पत्तियों में कड़वापन आ जाता है।
सामान्य मेथी में तुडाई 2 और 3 पत्तियाँ आने के बाद से भुरू हो जाती है। बुवाई के 20 से 25 दिन बाद पहली तुडाई जमीन की सतह से पौधे को तोड़ कर कर सकते हैं पर 30-35 दिन का होने पर खींच कर बाहर निकालना पड़ता है। बीजोत्पादन हेतु मेथी फसल में फूल आने से पूर्व दो तुडाई ले कर पौधों को फूलने-फलने हेतु छोड दिया जाता है। पकने के बाद फसल की कटाई कर ली जाती है। ज्यादा पकने पर कटाई करने से बीजो के खेत में बिखरने का, जबकि पूर्ण पकने से पूर्व कटाई करने से बीजों के सिकुड़ने की समस्या उत्पन्न होती है। पकने के समय पर, ऊपरी पत्तियों को छोडकर सभी निचली पत्तियाँ पीली पड़ कर गिर जाती हैं जो फसल के पकने की मुख्य पहचान है। कटाई के बाद पौधों को सूर्य की रौशनी में सूखने के लिए छोड़ देते है। सूखे हुए पौधों की मड़ाई तथा ओसाई करके बीज अलग कर देते हैं।
प्रति वर्गमीटर क्षेत्रफल में लगभग 3 से 5 किलोग्राम तक हरी पत्तियों की उपज प्राप्त होती है। सामान्य मेथी में 70 से 80 क्विंटल प्रति हेक्टेयर एवं कसूरी मेथी में 90 से 100 क्विंटल प्रति हेक्टेयर हरी पत्त्तियों की उपज प्राप्त होती है तथा दानों की उपज किस्मों पर निर्भर करती है जो औसतन 10 से 15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है।
शनिवार, 14 दिसंबर 2019
खस्ताहाल अर्थव्यवस्था को सही कारगर नीतियों की संजीवनी बूटी कब
दीपक कुमार त्यागी
स्वतंत्र पत्रकार व स्तंभकार
भारत की अर्थव्यवस्था (Indian Economy )की रफ्तार बढ़ाने के नरेंद्र मोदी सरकार के प्रयासों को शुक्रवार 29 नवंबर को उस समय तगड़ा झटका लगा जब केन्द्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक, लम्बे समय से मंदी की मार झेलने से बेहाल भारत की अर्थव्यवस्था में ताजा जारी किये गये आकड़ों के अनुसार और गिरावट देखने को मिली है।
इन आकड़ों के अनुसार चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में भारत की विकास दर में भारी गिरावट आयी है। ताजा रिपोर्ट के मुताबिक भारत का जीडीपी (GDP) ग्रोथ का आंकड़ा 4.5 फीसदी पहुंचा गया है। जो पिछले 6 वर्षों में किसी तिमाही की सबसे बड़ी गिरावट है। जीडीपी के आकड़ों में भारी गिरावट नजर आने के बाद अर्थव्यवस्था को लेकर देश में राजनीति शुरू हो गई है, केंद्र सरकार के कर्ताधर्ता एकबार फिर विपक्षी दलों के निशाने पर आ गये है।
वैसे भारतीय अर्थव्यवस्था (Indian Economy )की इस स्थिति के लिए देश के कर्ताधर्ताओं में कोई माने या ना माने, लेकिन यह कटु सत्य है कि कहीं ना कहीं यह मानव जनित आपदा है। सरकार के कुछ गलत आर्थिक निर्णयों के चलते आज भारत की अर्थव्यवस्था बेहद मंदी के नाजुक दौर से गुजर रही है।
देश में स्थिति यह हो गयी है कि भारतीय बाजार पर उसका दुष्प्रभाव अब आकड़ों की बाजीगरी के बाद भी छिपाया नहीं जा सकता है। लेकिन फिर भी ना जाने क्यों देश के नीतिनिर्माता स्थिति की गम्भीरता को अब भी समझने के लिए तैयार नहीं हैं, वो इस हालात को या तो जानबूझकर समझने के लिए तैयार नहीं है या यह भी हो सकता है कि उनकी टीम में शामिल लोग अर्थव्यवस्था को कमजोर करने वाले ठोस कारकों को पकड़ नहीं पा रहे हो।
खैर अर्थव्यवस्था कितनी भी खस्ताहाल बेहाल हो, लोगों को बेशक रोजीरोटी रोजगार ना मिल रहा हो उससे हमारे देश के चंद ताकतवर राजनेताओं पर कुछ असर नहीं पढ़ता है वो अब भी लोगों को बरगला के हिन्दू-मुसलमान , मंदिर-मस्जिद में उलझा कर भीड़तंत्र का बेहुदा माहौल बनाने में व्यस्त है। सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि वो भारत जैसे विकासशील देश की तुलना बात-बात में हर मोर्चे पर असफल पाकिस्तान से करके भारतीय जनसमूह से खूब तालियां बटोरते हैं।
वर्तमान में देश की अर्थव्यवस्था (Indian Economy )के इस हालात के लिए उच्च जीएसटी दरें, कृषि क्षेत्र में संकट, वेतनभोगियों के वेतन में कमी और नकदी की कमी आदि कारक की वजह से देश को भारी मंदी का सामना करना पड़ रहा है। साथ ही अर्थशास्त्रियों के अनुसार उपभोग में भारी मंदी के रुझान, जीडीपी विकास दर में लगातार गिरावट का सबसे प्रमुख कारण है। जिसके चलते भारतीय अर्थव्यवस्था के मजबूत स्तंभ ऑटोमोबाइल, पूंजीगत वस्तुएं, बैंक, कंज्यूमर ड्यूरेबल्स, एफएमसीजी और रियल एस्टेट आदि सहित देश के सभी प्रमुख सेक्टरों में भारी गिरावट आई है। जोकि अर्थव्यवस्था में मंदी का माहौल पैदा कर रहे हैं।
लेकिन फिर भी अपनी हठधर्मिता वाली नीति के चलते अब भी सरकार में बैठे कुछ लोग स्थिति को सामान्य बता रहे हैं। इस स्थिति में कहा जा सकता है कि देश की अर्थव्यवस्था की सरकार जितनी गुलाबी तस्वीर पेश कर रही है। हकीकत में धरातल पर हालात सामान्य नहीं हैं। इस स्थिति के लिए वजह चाहे जो भी हो लेकिन सरकार को चाहिए की वो तत्काल अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए सही नीतियों की संजीवनी बूटी की ताकतवर डोज प्रदान कर, इस गम्भीर बीमारी का उपचार कर संकटग्रस्त देशवासियों को राहत प्रदान करें। क्योंकि आजकल आर्थिक स्थिति को लेकर जमीन स्तर पर जो स्थिति बनती जा रही है वो देशहित में व आमजनमानस के हित में ठीक नहीं है। अब लोगों से उनकी रोजीरोटी रोजगार छिनने लगा है जिससे आमजन को भारी दिक्कत होने लगी है, देश में लोगों की नौकरी जा रही नये रोजगार पैदा होने के अवसर दिनप्रतिदिन खत्म होते जा रहे हैं। जिसके चलते अब देश के आमजनमानस को लगने लगा है कि सरकार आर्थिक मोर्चे पर पूर्ण रूप से विफल है और स्थिति उनके नियंत्रण से दिनप्रतिदिन बाहर होती जा रही है, जो हालत चिंतनीय हैं।
खस्ताहाल अर्थव्यवस्था (Indian Economy )की हालत पर भाजपा सरकार के नेता भले ही कहें कि कुछ लोगों को उनकी सरकार की आलोचना करने में मजा आता है। लेकिन हक़ीक़त यह है कि अर्थव्यवस्था के कई क्षेत्र इन दिनों बहुत संकट में हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक़ निजी निवेश में मंदी की हालत में सुधार के संकेत जल्द दिखाई नहीं दे रहे है। देश को धन उपलब्ध करवाने वाला बैंकिंग क्षेत्र फंसे क़र्ज़ (एनपीए) की समस्या से बेहाल है। कोयला, क्रूड ऑयल, प्राकृतिक गैस, रिफाइनरी प्रोडक्ट्स, उर्वरक, सीमेंट, बिजली और इस्पात देश के आठ महत्वपूर्ण कोर सेक्टर हैं। इन सेक्टर का देश के औद्योगिक उत्पादन इंडेक्स में लगभग 40 फीसदी का योगदान है। लेकिन वैश्विक मोर्चे पर बिगड़ती स्थितियों के बीच निजी निवेश और उपभोक्ता मांग में जबरदस्त सुस्ती के चलते भारत की आर्थिक वृद्धि लगातार कम होती जा रही है। जिसका उत्पादन वृद्धि और रोजगार सृजन पर भी दबाव पड़ा है। आईएचएस मार्किट का इंडिया मैन्यूफैक्चरिंग पर्चेजिंग मैनेजर्स सूचकांक (पीएमआई) निचले स्तर पर है। लागत बढ़ने और डिमांड घटने की वजह से मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की ग्रोथ में कमी आई है। PMI इंडेक्स घट रहा है। सोचने वाली बात यह है कि देश के कई क्षेत्रों में विकास की रफ्तार एकदम थम सी गयी है। मंदी की मार के चलते कमजोर होती अर्थव्यवस्था के ये हालात खुद प्रधानमंत्री मंत्री नरेंद्र मोदी के "फॉइव ट्रिलियन इकॉनमी" के सपने के लिए बेहद घातक है। अगर भारतीय अर्थव्यवस्था इसी तरह के ढ़र्रे पर चलती रही तो यह तय है कि मोदी का "फॉइव ट्रिलियन इकॉनमी" 5 trilion economy का सपना जल्द पूरा नहीं होने वाला है।
जो स्थिति आर्थिक रूप से देश की जनता के लिए व राजनैतिक रूप से भाजपा के लिए सही नहीं है। मंदी के यह हालात तेजी से विकास के पथ पर चलकर विकसित बनने के कतार में शामिल विकासशील भारत के लिए भी बेहद चिंताजनक है। इसलिए सरकार को मंदी की स्थिति से निपटने के लिए तत्काल प्रभावी कदम उठाने होंगे ।
मंगलवार, 4 जून 2019
असल छत्तीसगढ़िया मुख्यमंत्री भूपेश बघेल : अभी पुरखा के सपना पूरा होना बाकी हे !
वैभव बेमेतरिहा, रायपुर। मध्यप्रदेश से अलग राज्य बनने के 19 साल बाद मैं व्यक्तिगत तौर पर अनुभव कर पा रहा हूँ कि अब तक की चार सरकारेें मैंने जो देखी है उसमें असल छत्तीसगढ़िया मुख्यमंत्री का अनुभव भूपेश बघेल में ही कर पा रहा हूँ. यह बात मैं मुख्यमंत्री की तारीफ में नहीं कह रहा हूँ बल्कि अभी तक के उनके नीति-नियत में अगर शराबबंदी को अलगकर अन्य कार्यों की ओर का ज़िक्र करूँ तो यही दिख रहा है.
मसलन अगर छत्तीसगढ़ के चार चिन्हारी…नरवा-गरवा, घुरवा-बारी का ही अनुभव करके देखें तो यह सिर्फ नारा ही नहीं लगता बल्कि इससे एक जुड़ाव हर छत्तीसगढ़ियों को होता है. ये और बात है कि छत्तीसगढ़ की असल चिन्हारी यहाँ की बोली-भाषा है. वह बोली-भाषा जो बीते 19 सालों से अभी तक उपेक्षित रहा है. जिसे बीते सरकार ने सिर्फ राजभाषा का दर्ज दें खान-पूर्ति तक ही सीमित रखा. उसे आगे बढ़ाने का काम नहीं किया. ये और बात है कि छत्तीसगढ़ी का इस्तेमाल सरकारी विज्ञापनों में खूब हुआ, लेकिन पढ़ाई-लिखाई या सरकारी काम-काज में नहीं. क्योंकि छत्तीसगढ़ी हो या गोंडी-हल्बी या कोड़ूक-सरगुजही यह नेताओं के भाषणों की भाषा यहाँ बनकर रह गई है.
खैर यहाँ भाषा पर बात होगी तो मैं विषय केन्द्रित नहीं रह पाऊँगा. इसलिए फिलहाल असल छत्तीसगढ़िया भूपेश बघेल क्यों मुझे लग रहा है यह बताना जरूरी है. दरअसल अभी तक यही हो रहा था कि छत्तीसगढ़िया लोग खुद को दबे-कुचले हुए पा रहे थे. अधिकारियों की तानशाही और गैर छत्तीसगढ़ियापन वाला रवैय्या इस प्रदेश में इस तरह हावी हो रहा था कि उसमें मूल छत्तीसगढ़िया खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे थे. भूपेश बघेल के मुख्यमंत्री बनने के बाद खास तौर पर गाँव के लोगों को ये लगा है कि हो न हो इस नेता में छत्तीसगढ़ियापन तो झलकता है.
यहाँ बात भूपेश बघेल की तारीफ कि नहीं बल्कि मैंने अभी तक जो देखा वहीं लिख रहा हूँ. क्योंकि भूपेश बघेल जब बतौर मुख्यमंत्री छत्तीसगढ़ी में शपथ नहीं ले पाए थे तो उनसे पहली प्रेसवार्ता में सवाल करने वाला मैं ही था कोई और नहीं. खैर सोचने वाले जो भी सोचे लेकिन उन्हें यह बात तो माननी पड़ेगी, उन अधिकारियों की तरह जो अभी तक मंत्रालय से छत्तीसगढ़ियों को दरकिनार करके रखे थे. मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की कोशिश यही होती है कि अधिक से अधिक संवाद अपनी मातृभाषा छत्तीसगढ़ी में ही करेें. वैसे जब राहुल गांधी की मौजूदगी में नवा रायपुर में पहला कार्यक्रम सरकार बनने के बाद हुआ था तो उसमें बघेल से लेकर महंत तक ने छत्तीसगढ़ी में भाषण दिया था. इसके बाद यह भूपेश बघेल के छत्तीसगढ़ियापन का ही असर था कि विधानसभा के भीतर पहली बार मुख्यमंत्री से लेकर विधानसभा अध्यक्ष और नेता-प्रतिपक्ष सहित बड़ी संख्या में विधायकों ने छत्तीसगढ़ी में शपथ लिया था. उन विधायकों ने भी जिनकी मातृभाषा छत्तीसगढ़ी नहीं है. मैं यही कह रहा हूँ कि भूपेश बघेल के छत्तीसगढ़ियापन में कोई बनवाटीपन नहीं दिखता पूर्व के सरकारों की तरह.
ऐसी बात नहीं कि भूपेश बघेल ही छत्तीसगढ़ी में संवाद करते हैं कोई और नहीं. उनसे बेहतर छत्तीसगढ़ी और मीठ छत्तीसगढ़ी अजीत जोगी बोलते हैं. वैसे ये भी बात नहीं कि जोगी शासनकाल में छत्तीसगढ़ियापन न झलका हो. उस दौर में ही आंशिक रूप से छत्तीसगढ़ी में शिक्षा की शुरुआत हुई थी. वैसे भी स्वभाव और प्रभाव से जो लोकप्रियता ठेठ छत्तीसगढ़िया अंदाज वाले नेता के रूप में अजीत जोगी को प्राप्त है फिलहाल वैसा किसी को नहीं. लेकिन शासन तंत्र में छत्तीसगढ़ियापन को स्थापित जोगी नहीं कर पाए थे. और यही स्थिति तीन बार के मुख्यमंत्री रहे डॉ. रमन सिंह के साथ रही. उनके शासकाल में छत्तीसगढ़ी भाषा को राजभाषा का दर्जा तो मिला. लेकिन वे अपने 15 साल के शासनकाल में ठेठ छत्तीसगढ़ियापन नहीं ला पाए. जबकि रमन सिंह भी छत्तीसगढ़ी में बखूबी भाषण देते हैं. लेकिन एक सच्चाई जो पूर्व के सरकारों मुझे खलती है रही वह है शासन तंत्र के भीतर का छत्तीसगढ़ियापन.
यहाँ बात छत्तीसगढ़ी योजनाओं की नहीं है. क्योंकि जोगी शासन काल में जोगी डबरी एक योजना भी चली थी और रमन सिंह भी को चावल योजना के बाद चाउर वाले बाबा का तमगा मिला था. लेकिन योजनाओं से इतर बात छत्तीसगढ़ियापन को लेकर है, प्रशासन के भीतर छत्तीसगढ़ी की महत्ता को लेकर है. उसी महत्ता का जिक्र मैं यहाँ कर रहा हूँ. कम से कम भूपेश बघेल ने तो कहा कि अधिकारी छत्तीसगढ़ी में संवाद करें. वैसे करे तक सीमित रखने से काम नहीं चलेगा बल्कि इसे करते हुए दिखाना और बताना भी पड़ेगा.
अब बात उस पहल की ओर जहाँ से नीति और नियत को लेकर एक भरोसा मेरे भीतर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को लेकर जागा है. गढ़बो नवा छत्तीसगढ़ में एक निर्णायक कदम सरकार उठाने जा रही है यह जानकारी मिली है. जानकारी के मुताबिक सरकार नया रायपुर का नाम अब नवा रायपुर करने जा रही है. यही नहीं अब सभी जगह नया रायपुर की जगह नवा रायपुर ही लिखा जाएगा. सरकार का यह कदम छत्तीसगढ़ में पुरखों के सपनों को पूरा करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है. क्योंकि पूर्व की सरकार ने छत्तीसगढ़ के पुरखों की उपेक्षा में कहीं कोई कमी नहीं की है. ऐसे में छत्तीसगढ़ के प्रथम स्वप्नदृष्टा डॉ. खूबचंद के साथ भूपेश बघेल न्याय करेंगे ऐसी उम्मीद मैं कर सकता हूँ. उम्मीद है कि छत्तीसगढ़ के महानायक वीरनारायण सिंह, गैंद सिंह, गुण्डाधूर, महाराजा प्रवीरचंद भंजदेव, गुरु घासीदास, मिनी माता, पं. सुंदरलाल शर्मा, ठा. प्यारेलाल, बैरिस्टर छेदीलाल, चंदूलाल चंद्राकर, पं. श्यामलाल के सपनों को साकार भूपेश बघेल करेंगे.
उम्मीद यह भी कर सकता हूँ कि भूपेश बघेल के कदम नवा रायपुर तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि आगे बढ़ते हुए जल्द ही वे अपने, हमारे पुरखों के सपनों का छत्तीसगढ़ गढ़ेंगे. नया रायपुर से नवा रायपुर अटल नगर के भीतर प्रतिमाओं से लेकर चौक-चौराहों के नाम भी हमें अपने पुरखों के नाम पर रखने होंगे जिन्होंने पृथक छत्तीसगढ़ का सपना देखा था. नई पीढ़ी को उन पुरखों के बारे में बताना होगा जो अपने प्रदेश में भूला दिए गए हैं. सरकार की योजनाओं में छत्तीसगढ़ के उन विभूतियों के नाम रखने होंगे जिन्हें हमने अभी तक राष्ट्रीय पटल पर स्थापित ही नहीं किया है. वैसे सबसे बड़ी उम्मीद प्रदेश के मुखिया होने के नाते भूपेश बघेल से यह भी मेरी है कि जल्द प्रदेश के स्कूलों में मातृभाषा में पढ़ाई वे शुरू कराएंगे. जहाँ हल्बी-गोंडी, सरगुजी, कोड़ूक को सम्मान मिलेगा. जहाँ छत्तीसगढ़ी में सरकारी काम-काज होंगे. जहाँ हमारी मातृभाषा में बस्तर लेकर सरगुजा तक चौक-चौराहों के नाम लिखें होंगे. जहाँ हमारे पुरखों के पदचिन्ह हमें मिलेंगे. जहाँ हर कदम पर हम सबकों गर्व से यही एहसास होगा, भारत माँ के रतन बेटा बढ़िया अँव ग….मैं छत्तीसगढ़िया अँव ग…
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