इन्होंने नए कानून को जायज ठहराते हुए एक बयान जारी किया है. 1,100 हस्ताक्षर के साथ बयान में भारतीय संसद और सरकार को बधाई दी गई है. उन्होंने इस बात पर भी संतुष्टि जाहिर की है कि उत्तर-पूर्व के लोगों की चिंताओं को सुना गया और उन्हें संबोधित किया जा रहा है. उन्होंने कहा, 'हम मानते हैं कि CAA भारत के सेक्युलर संविधान के अनुरूप ही है, क्योंकि यह किसी धर्म के किसी व्यक्ति को नागरिकता के लिए अपील से नहीं रोकता है.'
समर्थन करने वालों में दिल्ली यूनिवर्सिटी, जेएनयू, इग्नू, कई आईआईटी और दुनिया के कई बड़े संस्थानों में पढ़ाने वाले भारतीय भी शामिल हैं.
इसमें कहा गया है कि इस कानून से पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में धार्मिक आधार पर प्रताड़ित अल्पसंख्यकों को शरण देने की पुरानी मांग पूरी होगी.
लियाकत-नेहरू समझौता असफल होने के बाद से ही कांग्रेस, सीपीआई(एम) सहित कई नेता और राजनीतिक दल इन्हें नागरिकता देने की मांग करते रहे हैं.
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